Phool Singh
Crime Thriller Others
सच्चा मोती ढूँढे न, मिलता
जीवन जिंगुर की तरह टिमटिमाता हो
हठीलापन ज्यादा दिन न चलता
जल्द ही हकीकत से फिर सामना हो।
स्वयं विसर्जित कर दंभ को
जब अमृत का कुम्भ सामने हो
धरा फोड़ जैसे अंकुर निकलता
व्यक्तित्त्व ज्ञान से निखरता हो।
होली है
भीड़ अर्थात ल...
मेरे पुरूषोत्...
राम श्री राम
रामलला घर आएं
वर्तमान में स...
मजदूर
सत्य पथ
आस्था
गणतंत्र दिवस ...
हर बार की तरह इस बार भी विफल पुरुषत्व की नकेल कसने में असफल ! हर बार की तरह इस बार भी विफल पुरुषत्व की नकेल कसने में असफल !
आदत सी हो गयी है अबनज़रअंदाज़ करने की.. आदत सी हो गयी है अबनज़रअंदाज़ करने की..
भूख में धोखा खा कर, शायद पेट भर गया होगा। फल ना सही बारूद सही, भीतर तो गया होगा। भूख में धोखा खा कर, शायद पेट भर गया होगा। फल ना सही बारूद सही, भीतर तो गया हो...
इंसानियत का इंसानियत से भरोसा उठ गया रोज़ रोज़ लड़ती है और हार जाती है जिंदगी। इंसानियत का इंसानियत से भरोसा उठ गया रोज़ रोज़ लड़ती है और हार जाती है ...
वो दर्द की रात थी... तेज बरसात थी... वो दर्द की रात थी... तेज बरसात थी...
कितने बेपरवाह हो गए ! क्या थे कल हम आज क्या हो गए ! कितने बेपरवाह हो गए ! क्या थे कल हम आज क्या हो गए !
नैतिकता का भारी ओढ़ लबादा नेतागण गलत शासन चला रहे हैं। नैतिकता का भारी ओढ़ लबादा नेतागण गलत शासन चला रहे हैं।
उन सज्जन लोगों से मैं पूछता हूँ की तुम्हारे बाज़ार में मेरी कीमत ही क्या है? उन सज्जन लोगों से मैं पूछता हूँ की तुम्हारे बाज़ार में मेरी कीमत ही क्या है?
बढ़ रही है नफ़रतों की सरहदें, हम फकत करते रहे बर्दाश्त क्या! बढ़ रही है नफ़रतों की सरहदें, हम फकत करते रहे बर्दाश्त क्या!
मैं आम आदमी हूँ, किसी की बहन को बहन नहीं मानता, मैं आम आदमी हूँ, किसी की बहन को बहन नहीं मानता,
गलती कोई और कर रहा है सज़ा किसी और को दिला रहा हूं गलती कोई और कर रहा है सज़ा किसी और को दिला रहा हूं
यूं तो हर रोज थी मगर उस दिन लगा सच में मैं थी एक गंदी गाली यूं तो हर रोज थी मगर उस दिन लगा सच में मैं थी एक गंदी गाली
मैं हतप्रभ हूँ, इन उग्र विचारों के बवंडर से, मैं हतप्रभ हूँ, इन उग्र विचारों के बवंडर से,
माँ तो अपना फर्ज निभा रही थी पर इंसान ने कौन सा फर्ज निभाया माँ तो अपना फर्ज निभा रही थी पर इंसान ने कौन सा फर्ज निभाया
अधमरा, फिर उन महान वीरों ने कर दिया। अधमरा, फिर उन महान वीरों ने कर दिया।
कभी धन की ताकत से तो कभी बल की ताकत से रचते अपनी कहानियाँ, कभी धन की ताकत से तो कभी बल की ताकत से रचते अपनी कहानियाँ,
जब लड़कियां घर के अंदर घुट घुट के मरती है, जब एक नन्ही सी जान कोई शोषण के डर से डरती जब लड़कियां घर के अंदर घुट घुट के मरती है, जब एक नन्ही सी जान कोई शोषण के डर...
मेरी चीख भी किसी को सुनाई नहीं दी मां बहुत दर्द में थी मैं मेरी चीख भी किसी को सुनाई नहीं दी मां बहुत दर्द में थी मैं
बसंत कुमार और विजय मौर्य ने दुश्मन के खट्टे दांत किए बसंत कुमार और विजय मौर्य ने दुश्मन के खट्टे दांत किए
ज़ो भी नज़ारे होते हैं उन नजरों में हो जाते हैं सब बेकार, हो जाते हैं सब बेकार। ज़ो भी नज़ारे होते हैं उन नजरों में हो जाते हैं सब बेकार, हो जाते हैं सब बेकार...