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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

Romance

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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

Romance

सावन को बरसते देखा है

सावन को बरसते देखा है

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सावन को बरसते देखा है

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खेतों में, खलियानों में,

सावन को बरसते देखा है ।

झर -झर झरती बूंदें मोती जैसी 

पेड़ों के पत्तों पर चमकती चांदी जैसी 

बीजों को पौधा बनते देखा है,

सावन को बरसते देखा है ।


धरती की भरती गोद 

हंसों को नहाते देखा है,

सावन को बरसते देखा है ।


नदी, नाले, ताल -तलैया भरते उफान 

सागर लेता हिलोर 

आसमान में इंद्रधनुष बनते देखा है,

सावन को बरसते देखा है ।


गोरी की आंखों में मदिरा का नशा 

मृदुल -मनोरम अमृत छलकाती बातें 

काली नागिन सी चाल 

सावन के प्यासे को तड़पते देखा है,

सावन को बरसते देखा है ।


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