Click here for New Arrivals! Titles you should read this August.
Click here for New Arrivals! Titles you should read this August.

Meenakshi Kilawat

Classics


4.1  

Meenakshi Kilawat

Classics


सांसों को नहीं संभाल पाते

सांसों को नहीं संभाल पाते

1 min 301 1 min 301

यह ख्वाहिशें ही तो है 

हमारे जान की दुश्मन

यह ख्वाहिशें ना हो जिंदगी में तो

बन जाएगा स्वर्ग जैसा जीवन।


अच्छा बुरा सोच सोच कर

जान को किया खत्म

ना होती यह सोच तो

छूट जाता हमारा अहमं।


सुबह शाम वही काम

ना करते मनन चिंतन

सर से पानी गुजरता जब

छोड़ ही देते हम वतन।


मुस्कुराहट आती जाती है

वह भी तो अब भूल जाते है

बैठे-बैठे जीवनका मोल गिनाकर

एहसास तो सबको दे जाते हैं।


हर चीज की जरूरत है यहां

रखना क्या चाहते हो अपने पास

और छोड़ना क्या चाहते हो 

एक वुसूल भी तो होता है खास।


हमने बहुत से पाले है शौक

वही ओढ़ते हैं वही बिछाते हैं

क्या-क्या आफत समेटते पर

सांसों को नहीं संभाल पाते हैं।


Rate this content
Log in

More hindi poem from Meenakshi Kilawat

Similar hindi poem from Classics