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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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रूबरू हैं खुद से

रूबरू हैं खुद से

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यूँ तो हम रूबरू हैं खुद से

कभी लगता है कि

हम इतना खो गये हैं खुद में

कि बेसुध से हो गये है

अकेले में भी अच्छा लगता है

लोग भी अच्छे लगते हैं

पर वो हालात जिसमें लोग हैं

हम हैं

स्पष्ट दिखता है

और जब हम उसे व्यक्त करते हैं

तो बिल्कुल अकेले हो जाते हैं

फिर बहुत अच्छा लगता है

कि जो देख रहे हैं सुन रहे हैं

वो नहीं जो महसूस कर रहे हैं

उसे शब्द देने की कोशिश कर रहे हैं।


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