रुकना मुझे ज़्यादा तोड़ गया
रुकना मुझे ज़्यादा तोड़ गया
लोग कहते हैं छोड़ना मुश्किल होता है,
मगर सच कहूँ — रुकना मुझे ज़्यादा तोड़ गया।
हर रोज़ दिल के खिलाफ़ खड़ा रहा मैं,
और ये रिश्ता मुझे अंदर ही अंदर छोड़ गया।
सोचा था वक़्त बदलेगा, हालात सँवर जाएँगे,
थोड़ा और सब्र करूँ, शायद दिन भी निखर जाएँगे।
ख़ुद को ही समझाता रहा — “इतना तो चलता है”,
पर सच ये है कि हर दिन मुझसे कुछ और छिनता है।
रिश्ते का दर्द शोर नहीं करता,
ये तो धीमे ज़हर की तरह उतरता है।
हर सुबह उम्मीदों के साथ उठते हैं हम,
और हर रात थोड़ा-थोड़ा बिखरता है।
बाहर से सब ठीक-ठाक दिखता है,
अंदर मगर सन्नाटा सा रहता है।
इंसान साँस तो लेता रहता है,
पर जीना कहीं पीछे छूट जाता है।
मैं साथ तो था, मगर महसूस नहीं किया गया,
मेरी आवाज़ थी, मगर सुना नहीं गया।
मेरी मौजूदगी आदत बन गई शायद,
इसलिए मुझे कभी चुना नहीं गया।
अब समझ आया है —
कभी-कभी छोड़ देना
हार जाना नहीं होता।
कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं
जो बिछड़ने से नहीं,
बल्कि रुके रहने से टूट जाते हैं।
कभी-कभी आगे बढ़ जाना ही
अपने बचे हुए हिस्सों को
समेट लेने का एकमात्र उपाय होता है।
क्योंकि हर ठहराव मंज़िल नहीं होता,
और हर विदाई हार नहीं होती।
