इम्तहान
इम्तहान
इस शहर में कर गुज़रने का कोई अरमान ही नहीं है,
आज़माइश को अब कोई इम्तिहान भी नहीं है।
वो तो मशरूफ़ रहता है मुझ पर उँगलियाँ उठाने में,
जैसे उसकी मेरे बग़ैर कोई पहचान ही नहीं है।
मेरे लहजे में तल्ख़ी है तो ये वक़्त की ही देन है,
वरना आदमी मुझ-सा बेवजह बदज़ुबान भी नहीं है।
वो कहता है कि मैं उसके क़ाबिल नहीं रहा,
मगर उसके पास सिवा मेरे कोई अरमान भी नहीं है।
ज़रा आईना दिखाया तो ख़फ़ा हो गया मुझसे,
उसे अपने सिवा कोई गुमान भी नहीं है।
मैं ख़ामोश सही, कमज़ोर समझना न मुझे,
मेरे सब्र-सा कोई जहां में तूफ़ान भी नहीं है।
जिसे फ़ख़्र था बहुत अपने ही आसमानों पर,
सच तो ये है कि ज़मीं पर उसका कोई मकाम भी नहीं है।
मेरा क़द यूँ ही नहीं ऊँचा हुआ हर निगाह में,
हर बार गिर के उठना इतना आसान भी नहीं है
