बेटियों गुरूर है
बेटियों गुरूर है
अल्फाजो में क्या ब्यान करे।
दिल से जुड़े दिल के तारों को तोड़ कोन पाया है।
माँ के दिल से जुदा ही कब थे।
हाथ थामे चल देते बिना सोचे समझे।
किस डोरी में बंधे बंधन अधखुले पन्नों में लिख दी।
तकदीरों में लिख दी ये बेटियां।
माँ की परछाईं के साथ चल पड़ी।
हाथो में हाथ थामे।
किसने देखी है परछाई।
माँ बेटी के दिल से पूछो।
कहां से कहां चली जाती है ये बेटियां।
कितनों के घर बसा देती है बेटियां।
फिर भी उनकी तकदीरों में क्यों लिख दिया जाता है।
पराई क्यों होती है बेटियों।
माँ बाबा का गुरुर होती है ये बेटियां।
घर की शान, माँ बाबा का अभिमान होती है ये बेटियां।
फिर भी किचड़ उछाल दिया जाता है,उनके ही चरित्र पर।
कितने के वंश बढ़ा कर नाम दूसरे का होता है।
क्यों होती है जलील बेटियां।
खुद की इज्ज़त दांव पर लगा कर माँ बाबा की इज्ज़त की खातिर।
दांव पर लग जाती है बेटियां।
क्यों नहीं समझते ये दुनियां उनके दिल में भी दर्द होता है।
जैसे लांछन तुम पर लगे। तो दर्द तुम्हे भी होता है।
क्यों करते बेगेरदो वाला सलूक । घर तेरा है। तो घर मेरा भी उतना ही है।
अंश तेरा था। तो क्या हुआ। नौ महीने कोक में मैने सिचा है।
खून मेरा ही बहा था। तो दर्द तुझे कैसे होता।
कुछ समझो घर की इज़्ज़त होती है बेटियां।
बेटियों घर को खुशियों से भर देती।
क्या लेकर से आई थी।
क्या लेकर जाएगी। बस खुशियां लेकर जन्मी थी।
खुशियों का बीज बिखेर कर पन्नपी है बेटियां।
बस यूं ही मुस्कुराती है बेटियां।
कितनों के दिल में बस जाती है बेटियां।
हमारी लाडो रानी बन जाती है बेटियां।
