आँखों की...
आँखों की...
आँखों की.....
आँखों और आँसुओं पर आधारित मेरी ये रचना :
दिखने में तो पानी जैसा, स्वाद में है नमकीन
बन पाया अहसासों से ,भरा हुआ जज्बातों से।
इन आँखों से निकला बूंदें बनकर के जो नीर
छलका आँखों से बन मोती, हो गया अनमोल।।
कैसे और कब रोती हैं:
दुनियाँ चाहे मैं हर पल मुस्कुराऊँ
वो खुशियों की हँसी मैं क्यों लाऊँ, क्योंकि.....
हँसता हूँ ज्यादा तो रो देती हैं आँखें
चमक आँखों की आँसुओं पे खो देती हैं आँखें
ये खामोश आँखें कहती हैं सब कुछ
आँखों की खामोशी कोई समझे तो
बिना कुछ कहे सब कहती हैं आँखें
कुछ भी हो बस रो देती हैं आँखें
फिर भी.........
बह़ाकर आँसुओं से हर खता धो देती हैं आँखें।।
जख्म दिल का हो या दर्द तन का हो
समां गम की हो या दौर खुशियों का हो
दिल को हो जो पल की दूरी का अहसास
बेचैनी में बिन बादल होये आँखों से बरसात।।
जब रूह में कोई बस जाता है
हर पल हर लम्हा वो याद आता है
पल पल चाहत को तरसती हैं आँखें
यादों में खोई हर पल बरसती हैं आँखें।।
दौर ख़ुशियों का हो या गम का
अक्सर इन आँखों को रोते ही पाया
कभी छलकते आँसू आँखों से
तो कभी गालों तक बहते हुए पाया।।
जब कोई हो जाये आँखों से दूर,
तो बिन उनके ये दिल हो जाये मजबूर
ये दिल ये आँखे दोनों होते हैं चूर
दिल के जख्मों पर आँखें रोती हो मजबूर।।
होती जब कोई ख़ुशहाली
सब मनाते होली और दिवाली
आँखों का तो अपना एक ही है नीर
खुशियों में भी आँखें होयें आँसू से भरपूर।।
