डर
डर
तुम जानते हो
मैं कितना डरती थी
शादी के नाम से
कि शादी भी नहीं
करना चाहती थी
उम्र बढ़ने के साथ-साथ
बढ़ते गए समाज के सवाल
कि बेटी शादी कब कर रही हो ?
और मेरे पास उनका
कोई जवाब नहीं होता
शादी के नाम से
एक अजीब सा
डर लगता था
न जाने क्यूँ
दिल सहम जाता था
माँ-बाप के कहने पर
न होते हुए भी
हाँ कहनी पड़ी
उनके इज्जत और
सम्मान के बारे में सोचकर
मुझसे मेरी पसंद
के बारे में पूछते
पर जो आपको पसंद हो
यही मेरा उत्तर होता था
और जब देखने के लिए
आए तो मेरा कोई
मन नहीं था
बस जिंदा लाश
की तरह इधर से उधर
घूम रही थी
पर जब हम दोनों को
अकेले छोड़ दिया गया
बात करने के लिए
आपने मुझसे मेरे
शौक और आगे क्या
करना चाहती हो
के बारे में पूछा
बस आप पूछते रहे
और मैं जवाब देती रही
आपका बेवाकपन और
सादगी मुझे अच्छी लगी
सब कुछ सही होता गया
कब रिश्ता पक्का हो गया
पता ही नहीं चला
फिर सगाई आ गई
एक दूसरे के हाथ में
अपनी निशानी दे दी
ऐसे ही वक्त निकलता चला गया
फोन में थोड़ा बात करते हुए
एक-दूसरे को समझते हुए
पर मेरे मन का डर अभी भी
वैसे का वैसे ही कही कोने में पड़ा था
मगर शायद तुम समझ गए थे
मेरे मन की व्यथा को
डर जो मेरे अंदर
समाया हुआ था
शादी को लेकर
और शादी से एक दिन पहले
जब तुमने पूछा था
यकीन करती हो मुझ पर
मैंने कुछ नहीं कहा
पर सारी रात सोचती रही
उस सवाल का जवाब
आखिरकार प्रणय का
वो दिन आ ही गया
सारी रस्में होती चली गई
जब तारों की छाँव में
सात फेरे होने से पहले
कन्यादान के समय
पिता जी ने मेरे हाथ
तुम्हारे हाथ में रखा
तब उस सवाल का
जवाब मुझे मिला
फेरे लेने के लिए
जब तुमने अपना
हाथ आगे बढ़ाया
मुझे सहारा देने के लिए
तो उस क्रिया में जवाब
था तुम्हारे सवाल का
हाँ, भरोसा करने लगी थी
और वो साथ फेरे, साथ वचन
मजबूत नींव बना रहे थे
हमारे आने वाले अनजाने
सफर के लिए
हर वचन और फेरों के साथ
मैं तैयार थी तुम्हारे साथ
चलने के लिए
नए जिंदगी के सफर में
माना कि हम दोनों ही
अनजान थे एक दूसरे से
नए सफर में चलने के लिए
पर हम दोनों का एक-दूसरे
के प्रति विश्वास ही काफी था
उस अनजान सफर के लिए
और देखो न
कितने खुश है हम दोनों
लोग कहते है प्रेम विवाह
किया होगा तुम दोनों ने
हम दोनों खिलखिला हँस
पड़ते है उनकी बातों पर
शादी को लेकर डर
सोचकर ही हँसी
आ जाती है
मगर स्वाभाविक है
भविष्य को लेकर
डर का होना
पर अनजान सफर में
किसी अजनबी का साथ
रोमांचक होता है
जिंदगी का सफर।
