STORYMIRROR

Shashi Aswal

Abstract

4  

Shashi Aswal

Abstract

लटें

लटें

1 min
293


अचानक पढ़ते समय

मेरे चेहरे पर लटें लहराई

जैसे बिन बादल के

बरसात झमाझम आई

हवा का साथ पाते ही

आकाश को छूने की तमन्ना

कभी इधर कमर बलखाती

कभी उधर नैन-मटका करती

अचानक ठिठोली की आवाज़

गूँजी मेरे कानों पर

मौन होकर सुनने लगी

उनकी कही बातों पर

लटों को काफी गुरूर था

अपने इठलाने पर

केश से लड़ने को

आतुर थी जंग पर

मैं तो अकेले ही

नारी की शान बढा़ती

मेरा साथ पाते ही

नारी मंद-मंद मुस्काती(लटें)

खुद पर मत इतरा

कि घमंड आ जाए

आखिर तू तो मुझसे ही

लिपटकर साथ आ जाए(केश)

उनकी बातों से परेशान

मैं भी हैरान हुई और कहा

बहुत सुन तुम्हारी बातें

अब नहीं हो सकती बातें

लटें केशों के साथ मिलाई

आँखों से नीदें मिलाई।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract