रिसता खून ...
रिसता खून ...
उफ !
कैसे ? कोई नीर रोकें ..
पांच माह की बच्ची,
और ..... दुष्कर्म ??
आंखों में उतरता खून ..
वीभत्स दृश्य .. उफ !
छोड़ा नहीं ..
जीवित ... इंतजार
मौत का रहा करता
अधमी ...
दारुण अंत ..
बिटिया का ..
कोसती माँ ..
ठौर नहीं पिता के दुःख का ..
कतरा कतरा
टपकता खून, रिसता ...
ऊपर से तकती,
खंजर सी चुभती अंखियां ..
काटती सारे तर्क,
फिजूल हैं सब विधान,
नारी का जहाँ नहीं,
सम्मान।
हटाना, ऐसे लोगों को समाज से है जरूरी ..
जीने का हक़ नहीं,
नृशंस हत्यारे को ...
सही निर्णय,
अदालत का,
सफाई समाज की अब,
हो गयी जरूरी ॥
