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VEENU AHUJA

Abstract

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VEENU AHUJA

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शून्य

शून्य

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एकाएक

शून्य बहुत करीबी हो गया


बसेरा दिलो दिमाग पर इसका ही हो गया


इच्छाएं हुयी शून्य

जिजीविषा भी हो गयी है शून्य


सब यही धरा रह जाना

तो होना न होना शून्य


मन की चेतना शून्य

शरीर का ताप भी होने लगा शून्य


अजब खालीपन

शून्य का


विस्मृति का यह दौर भी

भाने लगा


आंखों के आगे छाया शून्य

माँ , अंधेरे में हाथ तेरा था शून्य


नवजात सा निर्बल

औ असहाय


गम नहीं अब

ब्रहाण्ड के शून्य में मिल जाऊं


कहीं दिखूं नहीं

सुकून है जो हो जाऊँ शून्य ।


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