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Sandeep kumar Tiwari

Tragedy Others

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Sandeep kumar Tiwari

Tragedy Others

रौशनी चली गई

रौशनी चली गई

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उम्र भर भटका दर-बदर यूँ ही 

हँस कर सितम को भुलाता रहा 

किसी ना किसी से,यूँ ही जिंदगी में 

व्यर्थ की ही आशा लगाता रहा


एक को खो कर एक संताप से- 

फिर एक संताप को मिटता रहा 

मुरझाए हुए, आंसूओं की कली पे 

उम्मीद का भौंरा गुनगुनाता रहा


अब दाँत भी चले गए उम्र के प्रभाव से

सितम औ संताप कि कहासुनी चली गई

बुढ़ापे में अभी तो अंधेरा हुआ है 

क्या सितम है! आँखों कि रौशनी चली गई!!



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