पूर्ण हो जाएं
पूर्ण हो जाएं
ये कैसा उन्माद छाया
क्या सखी, वसंत आया
प्रकृति कर रही शृंगार
मदन कर रहे वार पर वार
फूल, पत्ते, पेड़, पौधे, नदी, पहाड़
सब में ये कैसा अजीब सा खुमार।
मन डोलने लगा क्यों, सजने संवरने को
तन में व्याकुलता क्यों
क्यों सब कुछ अच्छा सा अपना लगने लगा
क्यों नस नस में बिजली सी कौंध रही
बदन में किसके छुअन की बयार बह रही
क्यों आंखे इधर उधर डॉल रहीं
आंखें किसको किस कारण ढूंढ रहीं।
पेड़ से लिपटी लताएँ, चोंच से चोंच मिलाते
प्रेम भरे गीत गाते, क्यों चहक रहे हैं पंछी
भंवरो का गुंजन, क्यों रस भरे फूल
अपनी ओर खींच रहे
ये काम की कैसी सवारी
पूरी की पूरी प्रकृति की कैसी प्रेम भरी तैयारी
आज मिलेंगे बिछड़े प्रेमी।
आज होंगे गीत मिलन के
आज छेड़े जाएंगे तराने, आज होंगे नाच गाने
प्रिय आओ और दूर करो ये विरह वेदना
रग रग में लहू बनकर समा जाओ
मधु मास के मधुर मिलन में
तुम मुझमे और मैं तुममे समा जाओ।
आओ और करो रास
आओ खुले हैं हृदय द्वार, उतर जाओ
डूब जाओ और डुबा दो
बहा दो मुझे प्रेम की नदी में, डुबा दो मुझे अपने आप में
मैं अब मैं न रहूं, तुम अब तुम न रहो
जिसे कहना है कहते रहें निर्लज्ज।
आज मैं और तुम बस
आज न रोको कोई, आज न टोको कोई
पूरी प्रकृति साथ है, पूरी सृष्टि की सुहागरात है
मेरे प्रेमी मुझे बना लो
अपनी प्रेमिका से अर्धांगिनी
आओ आज पूर्ण हो जाएं
आओ आज शून्य हो जाएं।

