STORYMIRROR

अहसान बिन 'दानिश'

Drama

2  

अहसान बिन 'दानिश'

Drama

पुरसिश-ए-ग़म का शुक्रिया

पुरसिश-ए-ग़म का शुक्रिया

1 min
366


पुरसिश-ए-ग़म का शुक्रिया, क्या तुझे आग ही नहीं

तेरे बग़ैर ज़िन्दगी दर्द है, ज़िन्दगी नहीं।


दौर था एक गुज़र गया, नशा था एक उतर गया

अब वो मुक़ाम है, जहाँ शिकवा-ए-बेरुख़ी नहीं।


तेरे सिवा करूँ पसंद क्या तेरी क़ायनात में

दोनों जहाँ की नेअमतें, क़ीमत-ए-बंदगी नहीं।


लाख ज़माना ज़ुल्म ढाए, वक़्त न वो ख़ुदा दिखाए

जब मुझे हो यक़ीं कि तू हासिल-ए-ज़िन्दगी नहीं।


दिल की शगुफ़्तगी के साथ राहत-ए-मयकदा गई

फ़ुर्सत-ए-मयकशी तो है, हसरत-ए-मयकशी नहीं।


ज़ख़्म पे ज़ख़्म खाके जी, अपने लहू के घूँट पी

आह न कर, लबों को सी, इश्क़ है दिल्लगी नहीं।


देख के ख़ुश्क-ओ-ज़र्द फूल, दिल है कुछ इस तरह मलूल

जैसे तेरी ख़िज़ाँ के बाद, दौर-ए-बहार ही नहीं।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama