पुनजीर्वित हो बेहतर जीवन-मूल्य
पुनजीर्वित हो बेहतर जीवन-मूल्य
भौतिकता की अंधी दौड़ में,
भाग रहा है विश्व एक दूसरे को धकियाते,
इंसान के भीतर की तरल, सूक्ष्म, मृदु भावनायें,
मरती जा रही हैं स्वार्थ के बढ़ते प्रदूषण से,
सभी भावनायें जो पृथक करती हैं,
मनुष्य को पशु से,
दया, प्रेम, त्याग, सेवा,
निष्ठा, सच्चाई, ईमानदारी,
या कहें एक शब्द में मनुष्यता,
लुप्त होती जा रही मानव मन से।
दूर जा रहा आज एक इंसान दूसरे इंसान से,
धर्म, प्रतिष्ठा, ओहदा, अभिमान की मदद से।
ऐसी उच्च शिक्षा का क्या मतलब है,
जो बनाती है मनुष्य को,
डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर
पर आदमी को आदमी नहीं बना पाती।
आओ हम बनायें बेहतर इंसान,
जिससे बने हमारा बेहतर कल,
और पुनजीर्वित हों हमारे बेहतर जीवन-मूल्य।
