पुलवामा कांड
पुलवामा कांड
दो दिन से दिल का हाल कुछ ऐसा हो गया
आंखों से नींद दिल का चैन छिन गया।
जो बीती उन पर उसे बयां ना कर पाऊँ
लिखना भी चाहूँ तो शब्दों को धुंधला पाऊँ।
लेखनी भी कांपने लगी जब उस मंजर का सोचूँ
आँखों से बहती गँगा को मैं कैसे रोकूँ।
न सोचा था किसी ने अगले दिन का सूरज न देखेंगे
ना सोचा उन घरों नें कि चिराग जलने से पहले बुझेंगे।
घर घर में कोहराम मचा क्या हुआ समझ ना आया
दुल्हन बेवा, बच्चे अनाथ मां-बाप की ने अंतिम पूंजी को लुटाया।
परिवार का पालन हार गया घर का सुख चैन गया
हे प्रभु, ये कैसी विडम्बना इक पल में सब उजड़ गया।
इंसान की इंसानियत क्यों इस हद तक गिर गई
कितने मासूमों की जिंदगी क्यों षड्यंत्र की भेंट चढ़ गई।
कैसे लहू सफेद हुआ ,कैसे खून की होली खेली
डोली उठने से पहले ही लूटी, मां मरने से पहले मरी।
खून कुछ ऐसे खोल रहा जैसे मैं भी रणचंडी बन जाऊं
आतंकी के घर में जाकर सारा कुकर्म दोहरा आऊँ।
मजबूर है हम सब शांति दूत जिन्होंने हमेशा माफ किया
पर अब ऐसे नहीं चलेगा सबक अब सबको सिखाना पड़ेगा।
सियासत क्या और सियासत की मजबूरी क्या ,मैं ना समझ पाऊँ
जो हुआ उसका बदला लो बस यही सब से कहना चाहूँ।
फिर सोचूँ क्या होगा इससे ,गया लौट न आएगा
फिर से खून बहाकर भी क्या हासिल हो पाएगा!!
वीर भाइयों को श्रद्धा सुमन अर्पित कैसे करूं मैं
दिल खुद का रोता है कैसे किसी को ढाढस दे दूँ मैं।
