STORYMIRROR

Neerja Sharma

Abstract

4  

Neerja Sharma

Abstract

पत्र

पत्र

1 min
307

जब भी खोलती हूँ 

दिल की अलमारी 

बस हर बार वही

केवल वही पत्र

नज़रों के सामने

आ जाता है

बिना सम्बोधन

लिखा पत्र।


एक एक शब्द

मानो दिल में

बस से गए हैं

बिना पेज पलटे

बंद आँखों से

पढ़ जाती हर बार।

 

फिर

धीरे से मन के

कोने में दबा

आँसू पौंछ

बंद कर देती हूँ

मन की अलमारी

सहेज लेती हूँ

उस पत्र को

जो लिखा

मगर डाला नहीं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract