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Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

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Chandresh Kumar Chhatlani

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पतंग

पतंग

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अपनी ही कटी पतंग के पीछे दौड़ना,

आसमान में उसके ऊपर से नज़रें न हटाते हुए,

गलियां बदलना।


पैरों में चप्पल न हो परवाह नहीं,

किसके आसपास से गुजरे पता नहीं,

कदम सधे हैं या नहीं ये कौन सोचे,

लक्ष्य पाने को हमें कोई न रोके।


पा ही लेते हैं उसे हम येन केन प्रकारेण,

क्योंकि पांच रुपये की पतंग भी है इक सम्मान धन।

है न?



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