STORYMIRROR

Harish Sharma

Romance

3  

Harish Sharma

Romance

प्रतीक्षा

प्रतीक्षा

1 min
170

मैं हर बार लौटती रही

तुम्हें पुकारा कितनी बार

भावनाओं के बचे खुचे

अंतिम कुछ टुकड़े 

मैं ही सुलगाती रही

घुलती रही तुम्हारे मौन में

कड़वी स्याही बनकर कि

यदा कदा तुम अपनी ही खोई

परम अभिव्यक्ति को पा लो

कर पाओ स्वयं से साक्षात्कार।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance