तेरे आने का उसके जाने का ,
जश्न कैसे मनाऊँ ?
वो नस - नस में उतर गया है ,
ये दिल कैसे समझाऊँ ?
हुआ जो पाप मदहोशी में था ,
वो पाप नहीं था सनम ,
उसे तुझसे तुझे उससे ,
कैसे कभी मिलाऊँ ?
एक खालीपन मुझे उसके करीब ,
फिर से ले आया ,
उसके साथ गुजारे पलों के ,
अब नए राज़ छुपाऊँ |
इश्क रुकता नहीं ये सबक ,
अब लिख दिया मैने ,
इसके नशे के आगे नतमस्तक हो ,
अब मैं भी सर झुकाऊँ |
दो मर्दों की चाहत में ,
पिस गई कहीं औरत ,
तुझे यथार्थ उसे प्रतिबिंब बना ,
अब अपना जी बहलाऊँ ||