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Praveen Gola

Romance

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Praveen Gola

Romance

प्रतिबिंब

प्रतिबिंब

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तेरे आने का उसके जाने का ,
जश्न कैसे मनाऊँ ?
वो नस - नस में उतर गया है  ,
ये दिल कैसे समझाऊँ ?

हुआ जो पाप मदहोशी में था  ,
वो पाप नहीं था सनम ,
उसे तुझसे तुझे उससे ,
कैसे कभी मिलाऊँ ?

एक खालीपन मुझे उसके करीब  ,
फिर से ले आया  ,
उसके साथ गुजारे पलों के ,
अब नए राज़ छुपाऊँ |

इश्क रुकता नहीं ये सबक ,
अब लिख दिया मैने ,
इसके नशे के आगे नतमस्तक हो ,
अब मैं भी सर झुकाऊँ |

दो मर्दों की चाहत में ,
पिस गई कहीं औरत  ,
तुझे यथार्थ उसे प्रतिबिंब बना  ,
अब अपना जी बहलाऊँ ||



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