।। प्रश्न ।।
।। प्रश्न ।।
किस्मत कहूं,
मेहनत कहूँ,
रहमत कहूं,
या बस करम,
मिलता रहा,
जितना जगत में,
मन गङता रहा
बस उतने भरम ।।
वो मेरा इश्क था,
या दीवानगी थी,
उनकी नजरे करम,
या आशिक मिजाजी,
इम्तिहान कितने दिये,
इस मोहब्बत मैं हमने,
न जाने उन पे क्यों ,
दिल ये अबभी नरम।।
इसे पूजा कहूं,
या इबादत कहूं,
अपने भावों को मैं,
भक्ति से सींच लूँ,
मन बड़ा है विकल,
सांवरे तू बता,
कौन सा अब निबाहूॅ,
मैं अपना धरम ।।
ये डर है मेरा,
या झिझक अनकही,
कोई कुंठा कहीं,
या है सुलझी नहीं,
धीर कितना देखूँ,
मन से निर्बल हूँ मैं,
जग से कैसे छुपाऊॅ,
अब ये अपनी शरम ।।
फल मन मुताबिक मिला,
या न मन का हुआ,
जिंदगी प्रयास है,
या है बस एक जुआ,
इस ऊहापोह से,
मन ही व्याकुल रहा,
फिर है जो भी मिला,
खाई हो या चरम ।।
कर्म इस को कहूं,
या नाम मजबूरी का,
है परिश्रम से हासिल,
या झूठी मंजूरी का,
खुद में झांको जरा,
भरम तोड़ो भी अब,
प्रतिफल वैसा जैसे करते करम।।
प्रतिफल वैसा जैसे करते करम।।
