प्रिय मित्र
प्रिय मित्र
वही थी, वही है सबसे प्रिय मित्र मेरी,
दुनिया की भीड़ में न जाने कहाँ गुम गई मित्र मेरी।
जब से समझा अर्थ मित्रता का,
तब से रही वही मित्र मेरी।
चोट लगती मुझे तो कष्ट उसे होता,
बहते अश्रु मेरे नयनों से, रोता हृदय उसका,
मिलता पुरस्कार मुझे, नाचती प्रसन्नता से वह।
वही थी, वही है सबसे प्रिय मित्र मेरी,
दुनिया की भीड़ में न जाने कहाँ गुम गई मित्र मेरी।
सूर्य का रथ चलता रहा,
समय अपनी गति से भागता रहा,
कब हम हो गये योग्य विवाह के पता न चला।
विवाह करा चल पड़े अपने-अपने गंतव्य की ओर,
प्रसन्न थे दोनों ही पा मनपसन्द अपना-अपना साजन।
वही थी, वही है सबसे प्रिय मित्र मेरी,
दुनिया की भीड़ में न जाने कहाँ गुम गई मित्र मेरी।
पत्र लिख कर लेते थे बातें मन की,
मिलना भी होता रहा कभी-कभी,
थे सन्तुष्ट इतने से ही हम दोनों,
कि एक दिन मिला समाचार दुखदायी,
चल दिये थे पति उसके अन्तिम यात्रा पर।
वही थी, वही है सबसे प्रिय मित्र मेरी,
दुनिया की भीड़ में न जाने कहाँ गुम गई मित्र मेरी।
टूट गई, बिखर गई, दब गई,
गृहस्थी की समस्याओं के नीचे,
न था कोई उसे सम्भालने वाला,
अपनी समस्याओं में उलझी रही मैं,
न जा सकी सहायता को उसकी।
वही थी, वही है सबसे प्रिय मित्र मेरी,
दुनिया की भीड़ में न जाने कहाँ गुम गई मित्र मेरी।
कर लेते मन हल्का बातें कर कभी-कभी,
शहरों के बीच की हज़ारों किलोमीटर की दूरी,
न ला पाई दूरी हमारे बीच,
चलता रहा समय सूर्य के रथ पर हो सवार,
खडे़ हुये बच्चे अपने पैरों पर, सिकुड़ गई समस्यायें भी।
वही थी, वही है सबसे प्रिय मित्र मेरी,
दुनिया की भीड़ में न जाने कहाँ गुम गई मित्र मेरी।
बन्द हो गये उत्तर पत्रों के, लगता नहीं था फ़ोन भी,
सब छोड़, बिना बताये गई थी चली कहीं,
दबी रह गईं बातें कितनी ही हृदय के गर्भ में,
लगता है आकर पीछे से बन्द कर आँखें मेरी,
कह रही है “आ गई मैं खोल दे मन में बन्द पड़ी गाँठें ।"
वही थी, वही है सबसे प्रिय मित्र मेरी,
दुनिया की भीड़ में न जाने कहाँ गुम गई मित्र मेरी।
