परिंदा क्या चाहे
परिंदा क्या चाहे
परिंदा तो चाहे खुला आसमान
सुदूर गगन में भरना चाहे वो उड़ान
ना कैद करो तुम सलाखों में उसको
ना कतरो उसके फड़फड़ाते परों को
नाखुश है वो सोने के कफ़स में फंसकर
क्यूंकि ऊंची उड़ानों का रहा वो सिकंदर
बंदिशों में रहकर कहाँ उसे अन्न भाता है
जो खुद चुनकर ख़ुशी से दाना जुटाता है
मत कांटों-छाँटो ये हरे- भरे घने वृक्ष
तिनका-तिनका जोड़ वो नीड़ बनाता है
घनी वर्षा और हवा के गर्म थपेड़ों से
इन बसेरों में वो अपना जीवन बचाता है
परिंदा भी कहे...तुम भी जागो ए इंसान
थोड़ी इंसानियत रखो क्यों बनते हो हैवान
करो मेरा स्वागत, ज़रा मुंडेर पर आने दो
भोर होते ही बागों में खुलकर चहचहाने दो
रख सको नेह से तो रख दो पानी के सकोरे
मन भरकर चुगने को...दानों से भरे कटोरे
कुछ तुम भी सहयोग करो और वृक्ष लगाओ
आश्रय मुझे देकर थोड़ी मानवता दिखाओ
जो करना चाहो तुम प्रकृति की सुरक्षा
दफ़ना दो ना कहीं विकृत मानसिकता
पशु-पक्षी पेड़-पौधे है ईश्वरीय वरदान
इनके बिना ये ज़मीन जैसे है श्मशान
आओ सब मिलकर बचाएँ पर्यावरण
प्रेम और सुरक्षा का चढ़ाएं आवरण
