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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Romance

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Romance

प्रेम गीत

प्रेम गीत

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चलो आज मैं प्रेमगीत सुनाती हूं

भर मधुरस आंखों से सहलाती हूं


प्रेम ही तो जीवन का नवसृजन है

सृजन ही नवमनसिज आगमन है


भर मादकता इन प्यासे अधरों में

छलकता मदिरा जाम पिलाती हूं


श्वासों की धड़कन ही है मेरी सरगम

छेड़ मधुर-गीत वीणा राग सुनाती हूं 


पा स्पर्श तुम्हारा हुआ मुकलित मन है 

तन फुलवारी हो गयी केशर रंग तन है


तुम बिन जीवन का हर ख्वाब अधूरा 

आलिंगन पा तेरा,सप्तक राग हो पूरा।



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