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Meera Parihar

Romance

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Meera Parihar

Romance

प्रेम गीत

प्रेम गीत

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यह कैसा प्रिय गठबंधन है सात वचन और फेरों का।

बीत गये दिन-रात अनगिनत, जैसे दान दिलेरों का।।


सागर जैसी गहराई और पर्वत जैसी मिली पकड़।

तुम जल, मैं रही मीन, भय नहीं कभी मछेरों का।।


न जाने बरसातें कितनी हरित भूमि कर चली गयीं।

मैं पहनी परिधान धान, ज्यों सब स्वर्ण सबेरों का।।


छाये जब काले बादल , प्रीति बने उजियारे तब घन।

मेरे मौन पे हुआ समर्पित, शब्द हृदय आभारों का।।


तड़ित रूप व्यवधान मनोबल तोड़ न पाए अपनापन।

नापी तब पग भूमि, लिया सुख जीवन पथ अंगारों का।।


है मुझको अभिमान स्वत्त्व का, भार नहीं आभार प्रिये।

दोनों ने अपने, राग आलापे गुणगान किया मंजीरों का।। 


'मीरा' के जब हुए जवाहर कनक हार तब क्या करिए ?

अपना घर, सम्मान, समर्पण, लगे बोझ नहीं जंजीरों का।।


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