Preeti Sharma "ASEEM"
Drama
रिश्तों की पोटली,
उठायें फिरता था।
मैं हर रिश्ते पर,
नाज़ करता था।
सब मेरे है।
मैं सब का,
यहीं बात करता था।
हालात कुछ,
इस कदर,
आये सामने।
मैं किन से,
किन -की ,
बात करता था।
मैं तो एक वहम लिए,
रिश्तों की पोटली को,
उठाए बस सफर करता था।
आँचल की छाँव
धर्म के नाम प...
मकडज़ाल
मजदूर
अंतिम सत्य
वृद्ध समृद्ध
लिखने को
फुर्सत
बुरा ना मानो
आओ मिलकर पेच लड़ाये हवा में पतंग लहराये आओ मिलकर पेच लड़ाये हवा में पतंग लहराये
बे बुनियादी, रूढ़िवादी, कुप्रथा को मिटाकर ज्ञान का विज्ञान लाया हूँ, बे बुनियादी, रूढ़िवादी, कुप्रथा को मिटाकर ज्ञान का विज्ञान लाया हूँ,
मैंने पूछा अब ऐसा हुआ क्या खास है ना तुम्हें परवाह मेरी न कोई प्यास है, मैंने पूछा अब ऐसा हुआ क्या खास है ना तुम्हें परवाह मेरी न कोई प्यास है,
जख्म देने वाले दर्द देकर गए, हम दर्द सह कर भी मुस्कुराते रहे ।। जख्म देने वाले दर्द देकर गए, हम दर्द सह कर भी मुस्कुराते रहे ।।
जीवन क्या है, हमें क्या पता हमें क्या पता, हमें क्या पता जीवन क्या है, हमें क्या पता हमें क्या पता, हमें क्या पता
तुम्हें मैं कह नहीं पाऊं, मुझे कितना सताती है तुम्हें मैं कह नहीं पाऊं, मुझे कितना सताती है
घुँट-घुँट कर हर दर्द सहना पड़ता है। घुँट-घुँट कर हर दर्द सहना पड़ता है।
मेहनत करते हैं बेटे....... पर अव्वल आती है बेटियाँ, मेहनत करते हैं बेटे....... पर अव्वल आती है बेटियाँ,
पूछा जब मैंने उससे यूँ ही है देह व्यापार गंदा क्यों हाथ इसमें डाला था, पूछा जब मैंने उससे यूँ ही है देह व्यापार गंदा क्यों हाथ इसमें डाला था,
पैकेट को रास्ते में फेंक देते है क्यों की कोई दूसरा कचरा उठाये पैकेट को रास्ते में फेंक देते है क्यों की कोई दूसरा कचरा उठाये
तू ही मेरो भाई लगे माने कन्हाई तू ही मेरो भाई लगे माने कन्हाई
जिसे तुम निभाते चले गए नाम-ए-इश्क था जिसे तुम निभाते चले गए नाम-ए-इश्क था
आओ सखी कुछ मन में गुनें, और किसी को कष्ट ना हो ऐसे शब्द चुनें ! आओ सखी कुछ मन में गुनें, और किसी को कष्ट ना हो ऐसे शब्द चुनें !
कल कल करती नदियां, हरी चुनर ओढ़े हर तरफ से वादियां बुला रही है। कल कल करती नदियां, हरी चुनर ओढ़े हर तरफ से वादियां बुला रही है।
रुकती तो नहीं हैं ज़िंदगी मगर उसे जीना भी नहीं कहते हैं। रुकती तो नहीं हैं ज़िंदगी मगर उसे जीना भी नहीं कहते हैं।
मैं अब भी तुम्हें इतना चाहती हूं जितना कि पहले मैं अब भी तुम्हें इतना चाहती हूं जितना कि पहले
किसको किसकी क्या पड़ी है, इंसानियत में ये कैसी जंग छिड़ी है, किसको किसकी क्या पड़ी है, इंसानियत में ये कैसी जंग छिड़ी है,
हर एक दरार में गिला ढूंढ़ते हैं तेरी बेरुखी का सिला ढूंढते हैं हर एक दरार में गिला ढूंढ़ते हैं तेरी बेरुखी का सिला ढूंढते हैं
जब बहन डोली में बैठकर विदा हो तो ये भीग जाती हैं। जब बहन डोली में बैठकर विदा हो तो ये भीग जाती हैं।
फिर से नहीं हो युवा शिकार, बनाओ कानून ऐसा सरकार पेपर लीक पर तुरंत हो वार, फिर से नहीं हो युवा शिकार, बनाओ कानून ऐसा सरकार पेपर लीक पर तुरंत हो वार,