पिता..!
पिता..!
हमसे पूछो पिता का क्या अर्थ है..?
पिता है तो ख़ुशियाँ खनकती हैं,
पिता है तो मुठ्ठी भर आसमा ही नहीं
सारा जहां अपना है
जीवन तब चलता है जब पिता होते हैं
नहीं तो....!!
(2)
केवल ऊँगली पकड़ कर चलना ही नहीं सिखाते हैं,
जीवन के डगर पर सच झूठ की पहचान करवाते हैं।
वो एक पिता होने का फर्ज़ ही नहीं निभाते हैं अपितु
करुणा और मानवता का असली पाठ भी पढ़ाते हैं।
हाँ ख़ुद तो ता-उम्र तपते हैं आफताब बन कर्तव्य पथ
पर हमें हर तपिस से महफूज रखते हैं महताब बनकर।
