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संदीप सिंधवाल

Abstract

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संदीप सिंधवाल

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पहरे - ग़ज़ल

पहरे - ग़ज़ल

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निगाहों पर जमाने ने पहरे लगा रखे हैं 

कि क्या रिश्ते तुमसे गहरे लगा रखे हैं।


महल सा आशियाना बनाया था तुमने

बाहर चौकीदार गूंगे बहरे लगा रखे हैं।


तुमसे चाहत की चाहत रखते हैं लोग

तभी चेहरे पर कई चेहरे लगा रखे हैं।


इरादे भी नेक नहीं हुआ करते कभी

हार पर जो मोती सुनहरे लगा रखे हैं।


हकीकत ही तो अनमोल है 'सिंधवाल'

दांव पर कई सपने मेरे लगा रखे हैं।



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