पहलगाम की पीड़ा
पहलगाम की पीड़ा
वो घाटी जहाँ लिद्दर का जल, संगीत सरीखा बहता था,
कौन जाने उसकी लहरों में, बहुत बारूद रखा रहता था।
बेताब वैली मौन खड़ी, आँसू में भीग गई चुपचाप,
जहाँ हँसी थी पर्यटकों की, वहाँ लगे हैं बंदूक-चाप।
शालीमार के वृक्षों पर हैं, गोलों के गहरे घाव,
पीर-पंजाल की वादियाँ में जीवन लगा है दांव।
अमरनाथ के पावन पथ पर, खंजर की परछाई है,
भक्ति के पथ पर अब लगता, मौतों की गिनती आई है।
पहलगाम जहाँ गूँजती थी, बाँसुरियों की मधुर तान,
अब वहाँ बस सन्नाटा है, टूटा हर सुर का सम्मान।
शांति के नाम लिखे, घरों में दीवारें रोती हैं,
मातम के पोस्टर चिपके हैं, बंदूकें पहरे देती हैं।
गुलमर्ग की बर्फ पहले, मुस्कानों की भाषा थी,
अब वही बहती बूँद-बूँद आंखों में निराशा थी।
हे कश्मीर! तेरे सपनों को, किसने ऐसे रौंद दिया?
तेरे गुलशन को ज़हर दे, किसने कब्र को खोद दिया?
