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Priti Arun Tripathi

Abstract

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Priti Arun Tripathi

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फौजी भाई की राखी

फौजी भाई की राखी

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सावन के इस पावन दिन का

रहता इंतज़ार हर बहन को ये दिन "राखी" का

हँसती फुदकती हर ओर चहकती है

हर बहन के चेहरे पे इस दिन की

एक अलग ही ख़ुशी दिखती है,


रोरी, हल्दी का टिका करती हैं

आरती की थाल से नज़रे फेरती हैं,

भाइयों के हाथ की कलाई पे

अपनी पसंद की राखी बांधती हैं,


उसके लिए हज़ार दुआएँ माँगती है

बदले में अपना शगुन का नेग भी लेती है,

भाई-बहन का कुछ ऐसा ही रिश्ता होता है

जो हर एक जन्म में पवित्र, पावन और

सबसे गहरा रहता है,


मीलों सफर की ये दुरी है

और ये फ़र्ज़ भी तो ज़रूरी है

राखी पे इस बार नहीं आ सकता

ये सुनकर प्यारी बहना ना होना तू उदास,

तो क्या हुआ जो सिर्फ तेरे पास नही हूँ


न होकर भी तो हरपल मैं तेरे साथ तो हूँ

हर बरस के तेरे इस रक्षासूत्र की ही बदौलत

मुझमें है शक्ति जो बढ़ाती

मेरा हौसला हर वक़्त हर पहर।


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