पग पायल
पग पायल
उसकी बातें उसकी किस्से
न जाने कितने अफसाने थे
बिन फूल बाग महकते
ऐसे उसके हम दीवाने थे
बात बात में हंसती थी वह
बात बात में रोती थी
अपनी बात मनाने खातिर
अविरल अश्रु बहाती थी
स्वर में थी मिश्री मिश्रित
अधर जस मधुशाला सी
मुस्कानों से कहर बरपाती
हर बात उसकी निराली थी
पग पायल चांद चमकते
बिंदी चमकते ध्रुव तारा सी
नथनी में इन्द्र धनुषी माया
ऐसी अद्भुत वो बाला थी
कभी भाव से जानी मानी
कभी लगती अनजानी सी
दिल की बात द्वंद्व समर्पित
आदत ये उसकी पुरानी थी
चुभे जब अप्रत्यय का खंजर
जाकर मंज़र तब पहचाने थे
दर्पण एक पर चेहरे कितने
गिनती के न ठिकाने थे ।

