STORYMIRROR

MRIDULA SINHA

Abstract

3  

MRIDULA SINHA

Abstract

नीड़

नीड़

1 min
182

कई बार उड़ती है

मुंह में तिनका तिनका संजोए

हर बार हर छोटी सी आशा के साथ

देखती हूं अपनी खिड़की से उस नन्ही सी चिड़िया को

अपने घरौंदे के लिए 

हर जतन कर जाती है


हौले हौले से एक तिनका सजाती है

अपने बच्चे को, एक एक दाना मुंह में डालती है

हर धूप छांव बारिश से बचाने को,

चीं चीं करके अपने दुश्मनों से भी लड़ जाती है

जब टूट जाता है वो नीड़ 

तब शायद वो भी टूट जाती है

अब जब उसे नहीं मिलता पेड़ों की टहनियां और कोटरें

वो मजबूर हो जाती है,


इंसानों के घरों में ही अपनी नीड़ बसाने को

और तोड़ देता है इंसान उस नीड़ को बिन सोचे और समझे

और फिर कहीं टूट जाती है वो चिड़िया भी



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract