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MRIDULA SINHA

Abstract

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MRIDULA SINHA

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वक़्त

वक़्त

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कब बीत जाता है वक्त

सब संभलते हुए भी बिखर जाता है वक्त

कुछ सपनों का हौसला हमें भी तो दो

बेशक टूट जाएं हम अपनी ही गलतियों से

पर कुछ मुस्कराने का मेरा हिस्सा मुझे भी तो दो

लौट कर ना आएंगे फिर कभी यूं दर पर तेरे

मेरे बेबसीपन को संवारने का एक माहौल तो दो

चल पड़े हैं कुछ किस्से मेरे भी इस शहर में

गुमनाम होने से पहले कुछ नाम होने तो दो

वक्त सुना है तेरे दामन में गजब का सुकून है

बस कुछ पल मुझे मुझसे मिलने तो दो

जम चुकी है कई जमाने से अपनों की बातें

,उस नफरत की बर्फ को थोड़ा पिघलने तो दो

वक्त तुझसे बड़ा कोई ना मिला मुझे इस दुनिया में

थोड़ी दुनियादारी मुझे भी कुछ सीखने तो दो



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