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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Inspirational

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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Tragedy Inspirational

नई राह बनाएं ।

नई राह बनाएं ।

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उठो! चलो! अब नई राह बनाएं!


उठो जागो, अब सोना क्या,

सपनों को अपने खोना क्या?

बादल बन गरजो तुम,

नदी सा रुकना-थमना क्या?

मिलकर आओ, साथ चलते जाए।

उठो! चलो! अब नई राह बनाएं!


हवाओं से भी तेज़ चलो तुम

बिजलियों सा चमको तुम,

डर ना जाना अंधेरों से तुम,

मुश्किलों से न घबराना तुम!

खुशियों की बगिया में, फूलों को सजाएं।

उठो! चलो! अब नई राह बनाएं!


गिरोगे, संभलोगे, राह बनाते,

चमकोगे ऐसे जग को लुभाते!

मंज़िल हो दूर, तो हिम्मत न हारेंगे,

हौसलों की रोशनी में, राह संवारेंगे।

वही तो ज़माने में सूरज कह लाएं!

उठो! चलो! अब नई राह बनाएं!


हर रात के बाद सवेरा होगा,

जो गिरा, वो खड़ा भी होगा!

जो डर गया, वो मिट गया,

जो चल पड़ा, वो जीत गया!

सूरज सा चमकें हम अंधियारे मिटाएं,

उठो! चलो! अब नई राह बनाएं!


हर दुख को अपनी मुस्कानों में छिपाए,

कदम-कदम पर खुशी के गीत गाए,

जो भी आए, उसे अपनाएं,

हर दिन हर पल को उत्सव मनाएं!

हर दिलों में उमंगों के दीप जलाएं।

उठो! चलो! अब नई राह बनाएं!


 दुनिया की सोच में क्यों सोचें हम?

अपने रास्ते अपनी मंजिल खुद खोजें हम!

जिधर भी चलें, जिधर भी जाए खुशबू फैलाए,

खुशबू बन हम हर दिल को महकाएं!

तो आओ मिलकर हम कुछ कर जाए,

उठो! चलो! नई राह बनाएं!



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