" नारी -नारायणी "
" नारी -नारायणी "
नारी तुम हो स्वयं नारायणी
तुम्हारा संसार में गुणगान भारी
हर उम्र में खेल सकती हो नयी पारी
क्यों करना इंतज़ार आये मेरी बारी
कसो कमर लो हर जिम्मेदारी
क्यों सीमित रहना चार दीवारी तक
जब जीत सकती हो तुम सृष्टि सारी।
कभी माँ, पत्नी , बहिन कभी बन बेटी
निभाती हो श्रद्धा से हर किरदार
तुम में बसती शक्ति अपार
पर काट दो बंधन की बेड़ी
और त्यागो जबरन की दुनियादारी
रखो ध्यान मान मर्यादा प्रतिष्ठा का
पर क्यों अपनी इच्छाएं मारी।
पहचानो अपनी क्षमता इस बार
हर रिश्ते हर रूप में हो प्यारी
चिरकाल से रही संघर्षरत शोषित
लेकिन अपने पराये आघातों से कब हारी
कभी सीता से ली गई अग्निपरीक्षा
कभी अहिल्या को माना समाज ने पतित ।
तुम्हारी हर गाथा करती है मन व्यथित
तुमने सिर्फ पुरुषों के घर नहीं
अपितु जीवन और मन किये व्यवस्थित
हुआ बहुत अन्याय अपमान अनाचार
अब समय है पुरुषवर्ग करे विचार
जिस अबला पर किया हमने क्रूर प्रहार
आज है वह अत्याधुनिक
आर्थिक मानसिक सक्षम सहयोगी।
दोहराओ इतिहास बन के लक्ष्मी सहगल
कभी पी टी उषा या किरण बेदी
पुरुषों से तुम्हारी क्या होड़
नारी तुम्हारी नहीं कोई बराबरी
तुम युगों युगों से हो श्रेष्ठतम व पूजनीय।
नारी तुम हो नारायणी
नारी तुम स्वयं हो नारायणी।
