Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

Ruby Prasad

Tragedy Others


3  

Ruby Prasad

Tragedy Others


नारी मन की खामोशी

नारी मन की खामोशी

1 min 254 1 min 254


नारी की खामोशी को 

कहते है गुरूर जो

नहीं जानते कुछ

ठोकरे वक्त के

साथ साथ अपनों से 

ऐसी खाती है वो

कि लड़_लड़ के 

थक जाता है उसका मन

वक्त भी कम सितम नहीं ढाता

एक झटके में छीन 

लेता है बचपना

मूक हो जाती है तब जब

लोग उसकी हँसी को भी

साज़िश बताते है


उस हँसी को जो

पहचान थी उसकी

बाबूल के आंगन की

जान थी उसकी

हर बात में ताने

हर बात में उपदेश

सुन-सुन कर जब 

थक जाता है मन 

तब हो जाती है

वो खामोश

इन सबसे परे

ऐसा नहीं कि

यकीं उठ गया है

उसका सबसे

नहीं 

तब तो और यकीं हो

जाता है उसे

वक्त पर 

क्योंकि ठोकरे

खोल देती है उसकी आँखें


मानो कह रही हो 

कि देखो मैं बनकर 

आया हूँ बुरा वक्त जीवन में तेरे

ताकि तुम पहचान सको 

सबके साथ खुद को भी

कर सको

फर्क अपनों में सपनों में 

हर पल

जो दुत्कार और अपमान का

तोहफ़ा देते है अपने  

उससे गहरा बहुत गहरा यकीं 

हो जाता है उसे वक्त पर

क्योंकि एक पल में जैसे बड़ी 

हो जाती है वो

वैसे ही एक पल में पता चल

जाती कीमत सच्चाई की

अच्छाई की 


त्याग की मांग की 

यकीं हो जाता है उसे कि चाहे 

कितने भी बोल ले मीठे बोल कोई 

रच ले कितने ही षडयंत्र 

बेनकाब हो ही जाते है मुखौटे 

एक न एक दिन 

तभी नहीं बोलती है वो ज्यादा 

हो जाती है खामोश 

क्योंकि 

ठोकरों से सीख लेती है 

वो करना यकीं 

वक्त के साथ-साथ 

खुद पर भी !!




Rate this content
Log in

More hindi poem from Ruby Prasad

Similar hindi poem from Tragedy