मुझ सा नहीं मिलेगा
मुझ सा नहीं मिलेगा
आता समझ नहीं है बिन बात रूठ जाना
आदत ही बन गया है तेरा मुझे सताना
मनुहार जब करूं मैं दिल को मिले तसल्ली
शायद लगा है भाना मेरा तुझे मनाना
होकर ख़फा यूं मुझसे देना सजा है मुझको
अब काम तेरा है बस नींदे मेरी उड़ाना
करके सितम तू मुझ पर ये जान भी तू ले ले
देकर भी जान अपनी आता मुझे निभाना
चाहूं मैं तुझको जीतना चाहेगा कौन उतना
मुझसा नहीं मिलेगा जिसे चाहे आज़माना।।
शुभम आनंद मनमीत
