STORYMIRROR

Shubham Anand Manmeet

Classics

4  

Shubham Anand Manmeet

Classics

कभी जो अभ्र जम जाए

कभी जो अभ्र जम जाए

1 min
24

कभी जो अभ्र जम जाए तो शीशा तोड़ मत देना, 

बिखर जाए अगर सपने सजाना छोड़ मत देना।


उठाए जा सितम दिल पे अपने भी पराए भी 

किसी भी मोड़ पर ये दिल के रिश्ते तोड़ मत देना।


अगर तकलीफ ना हो तो भला फिर जिंदगी कैसी 

देखकर सामने गर्दिश निगाहें मोड़ मत लेना।


मुसाफिर हूं मैं चलता ही रहूंगा आख़री दम तक

यही सोच पग बढ़ाना इरादे तोड़ मत देना।


- शुभम आनंद मनमीत


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Classics