मतलबी रिश्तेदार
मतलबी रिश्तेदार
हर चेहरा मुस्कान लिए आता, पर मन में कुछ और कहानी,कुछ रिश्ते बस नाम के होते, जिनमें रहती स्वार्थ की रवानी।जब लाभ दिखे तो पास चले, जब दुख आए तो मुँह मोड़ें,ऐसे रिश्ते मौसम जैसे, पल-पल रंग ये तोड़ें जोड़ें।वे याद रखें दूसरों की, छोटी सी चूक पुरानी,पर अपनी गलती भूल जाएँ, जैसे न हो कोई निशानी।जहाँ स्नेह नहीं बस गिनती है, वहाँ दिल नहीं टिक पाते,जब भाव घटे और स्वार्थ बढ़े, तब रिश्ते टूट ही जाते।आज सुविधा का दौर चला है, भावनाएँ बिकती जातीं,हर कोई सोचता पहले, क्या मुझे खुशी दिलाएगी बाती।मोलभाव की इस दुनिया में, अपनापन सूख गया है,मानवता के इस बाजार में, प्रेम भी अब झुक गया है।भौतिकता की दौड़ में अब, संवेदना थक जाती है,अहंकार के ऊँचे पर्वत पर, विनम्रता चढ़ न पाती है।जो सच्चे दिल से निभाते हैं, वे भी अंत में रो जाते,क्योंकि निष्कपट मन वाले अब, भीड़ में खो से जाते।रिश्ता वही अमर रहेगा, जिसमें प्रेम का संचार हो,देने में ही सुख मिले जब, तब जीवन में आधार हो।मानवता की सच्ची राह, प्रेम और करुणा की बानी,निष्कपटता ही वो रौशनी, जो रिश्तों में लाए रवानी...D.T लेखक – देवाशीष तिवारी
