बड़े भाई का फर्ज
बड़े भाई का फर्ज
जब बहन की डोली उठती है, घर आँगन भी रो पड़ता है,हँसी में छिपी विदाई की कसक, भाई का मन भी थोड़ा डरता है।बचपन की वो किलकारियाँ, अब स्मृतियों में सिमट जाती हैं,जो गुज़री हँसी की बातें थीं, अब आँखों में झलक जाती हैं।बड़ा भाई तब संभलता है, जब सब भावों में बह जाते हैं,वह चुपचाप सब दुख सहकर, घर की नींव संभाल जाते हैं।उसके माथे पर चिंता की लकीरें, पर चेहरे पर संतोष भरा,कि बहन के सपनों का संसार, अब हुआ साकार खरा।शादी की हर तैयारी में, उसका मन लगा रहता है,कभी मेहमानों की चिंता, कभी साज-सज्जा में बहता है।अपनी थकान को भूल कर, हर ज़रूरत पूरी करता है,बहन की हँसी के लिए ही, वह खुद को भी न्योछावर करता है।विदाई की घड़ी जब आती है, उसकी आँखें नम हो जाती हैं,पर दिल में दुआएँ लेकर, वह बहन को विदा कर जाती हैं।कंधे पर नहीं बस जिम्मेदारी, प्रेम और सम्मान का भार है,बड़ा भाई सच में बहन का, जीवन भर का पहरेदार है।वह सोचता है उसके ससुराल में, हर दिन मुस्कान बनी रहे,ना आए कोई ग़म उसके पास, ना आँसू आँखों में पले रहें।समय मिले तो हाल पूछे, उत्सव में उपहार पहुँचाए,बहन की दुनिया में स्नेह का, दीपक सदा जलाए।बड़ा भाई वही जो बहन की, हर खुशी में रमा रहे,शादी हो या जीवन की राह, उसके संग सदा खड़ा रहे।उसका फर्ज न रुकता कभी, न प्रेम में आती कमी,यही तो है परिवार का बल, यही तो जीवन की गरिमा जमी।लेखक : देवाशीष तिवारी
