मदिरा — एक टूटता घराना
मदिरा — एक टूटता घराना
कभी था घर में हँसी का उजाला,अब गूँजता है सिसकियों का हवाला।मदिरा ने मनुष्य को बाँध लिया इस तरह,कि जीवन का अर्थ खो गया कुछ कहर।हँसते थे बच्चे, अब डरते हैं रातों में,माँ की आँखें भीगती हैं बातों में।जिसे सहारा समझा गया था पलभर को,वही बना तूफ़ान घर के भीतर को।नशे की लहर में डूब गया संयम,फीका पड़ा स्नेह, बिखर गया अपनापन।पत्नी का स्नेह हुआ बोझिल अब,हर दिन बन गया एक अनकहा सबक।जो श्रम का फल था, वो मदिरा में गया,परिवार का सुख हर घूँट में बह गया।हँसी की जगह अब भय का साया है,नशे के आगे सब कुछ हाराया है।बालक की आँखों में अनजाना डर,क्यों पिता अब नहीं वही सच्चा घर।वो पूछे मन ही मन यह सवाल,क्या प्रेम का रूप यही है काल।समाज भी रोता है इन दृश्यों पर,जहाँ बिखरता है हर स्नेह का स्वर।मदिरा नहीं देती कोई शांति का दान,बस छीन लेती है जीवन का मान।आओ करें प्रण आज यही,घर को बनाएँ फिर प्रेममयी।संयम से ही है जीवन का सार,नशामुक्त मन ही सच्चा त्यौहार....D.Tलेखक : देवाशीष तिवारी
