STORYMIRROR

Devashish Tiwari

Abstract Classics Others

4  

Devashish Tiwari

Abstract Classics Others

देह व्यापार — समाज का मौन संताप

देह व्यापार — समाज का मौन संताप

1 min
0

कभी थी सपनों की उड़ान भरी,अब बंधी जंजीरों में जीवन ठहरी।भूख और हालातों की मार में घिरी,स्त्री फिर एक सौदे की वस्तु बनी।जब रोटी ने सम्मान से लड़ाई की,तो विवशता ने राह दिखाई थी।शिक्षा की कमी, अंधेरे का घेरा,भटक गए पथ, बुझ गया सवेरा।घर की दीवारों में हिंसा थी गूँजी,दहेज, अपमान, तिरस्कार की पूंजी।जिसने छोड़ा घर, वो कहाँ जाती,समाज की राहें भी संकरी थीं सारी।कभी छल से, कभी तस्करी के जाल में,फँस गई नारी बेबसी के हाल में।कोई कहे भाग्य, कोई कहे अपराध,पर सच्चाई है — यह सामाजिक आघात।नशे की लत, चमक का प्रलोभन,शहर की रौनक में खो गया जीवन।शोहरत और धन की झूठी चमक,छीन ले गई मन की सच्ची दमक।लैंगिक भेद, असमानता का दौर,जहाँ नारी को नहीं मिला अधिकारों का ठौर।पुरुष की दुनिया में सीमित परिभाषा,बन गई स्त्री केवल एक तमाशा।तकनीक ने दी दुनिया को पंख,पर बढ़े अपराधों के नए भी अंक।डिजिटल जालों में फँसती जवानी,विज्ञापन बनी उसकी कहानी।अब समय है जागने का समाज,नारी का सम्मान हो उसका ताज।शिक्षा, सशक्तिकरण, संवेदना का संग,तभी मिटेगा यह दुख का रंग।गरीबी मिटे, बढ़े अवसर समान,नारी को मिले फिर स्वाभिमान।जब हर स्त्री होगी स्वतंत्र और प्रखर,तभी कहलाएगा सच्चा समाज अमर....D.Tलेखक : देवाशीष तिवारी


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract