प्रेमानंद — आत्मबोध से प्रेमबोध की यात्रा
प्रेमानंद — आत्मबोध से प्रेमबोध की यात्रा
अखरी ग्राम की पावन धरा पर, ज्योति एक उजियारी थी,
तेरह बरस की कोमल उम्र में, विरक्ति ने अंगियारी थी।
छोड़ा घर, छोड़ी ममता सारी, ली तप की ठंडी छाँव,
गंगा तट पर साधन रच दी, जैसे कोई जीवित भाव।
काशी नगरी के घाट किनारे, ध्यानमग्न वह योगी था,
भिक्षा में केवल प्रेम लिया, गंगाजल ही भोगी था।
पीपल के नीचे मौन समर्पण, जब प्रभु का संकेत मिला,
रासलीला के दर्शन से मन, प्रेम सुधा में भीग चला।
ज्ञान जहाँ था मौन, वहाँ अब, भक्ति का स्वर गूंज उठा,
वैराग्य के शुष्क वन में जैसे, प्रेम का सागर फूट उठा।
राधावल्लभ की पावन धारा, मन को रस में डुबो गई,
राधे-श्याम के नाम में, उनकी दुनिया खो गई।
वृंदावन की पावन धरती, अब उनका आश्रय स्थान,
जहाँ हर श्वास में राधे नाम, हर हृदय में भगवान।
कहते — “ज्ञान अधूरा है जब तक, उसमें प्रेम न बस जाए,
प्रेम ही है वो सेतु जो, जीव को ईश्वर तक ले जाए।”
त्याग, तपस्या, प्रेम, सेवा — जीवन का सच्चा सार,
युवाओं को दिखलाते हैं, प्रेम ही धर्म, यही उद्धार।
उनकी वाणी में राधा रस, आँखों में कृपा की धार,
प्रेमानंद महाराज हैं जैसे, प्रभु का जीवित साकार।
आत्मविस्मृति से आत्मबोध तक, यह पावन यात्रा है,
ज्ञान में प्रेम, प्रेम में ज्ञान — यही उनकी साधना है।
जग को सिखाया उन्होंने — “भक्ति का सच्चा अर्थ यही,
जब हृदय बने राधे मंदिर, और प्रेम बने जीवन रीत यही....D.T
लेखक : देवाशीष तिवारी ✍️
