दीपावली — परंपरा की ज्योति और आधुनिकता की चमक
दीपावली — परंपरा की ज्योति और आधुनिकता की चमक
जब आती थी दीपावली, तब दिल भी जगमग होते थे,मिट्टी के दीयों की लौ में, सपने स्नेह से रोते थे।हर आँगन में गीत गूँजता, हर मन में थी ज्योति नई,वह रोशनी केवल बाहर की नहीं, आत्मा में उतरती थी कहीं।माँ लीपती थी आँगन अपना, बापू सजाते द्वार सदा,बच्चे संग मिल दीप जलाते, हँसी गूँजती थी हर दिशा।घी की लौ में श्रद्धा जलती, तेल में श्रम की गंध बसी,वह सोंधी मिट्टी कहती थी, यही है पूजा की असली हँसी।अब झालरों ने ले ली जगह, जहाँ दीपक दमकते थे,मिठाइयों के स्वाद बदल गए, जो पहले घर बनते थे।मोबाइल की रोशनी में अब, चेहरे उजले दिखते हैं,पर दिलों में जो warmth थी, वो दीप कहाँ अब दिखते हैं।पहले दीपावली मन का पर्व, अब बाजार की दौड़ हुई,सजावट में सौंदर्य तो है, पर आत्मा थोड़ी और हुई।जहाँ पहले बाँटते थे दीप, अब पोस्टों में मुस्कान है,पर भीतर की जोत जलाना, यही सच्ची पहचान है।फिर भी जब कोई दीया जलता, दरवाज़े पर धीरे से,वह बतलाता — रोशनी बाहर नहीं, जलती है दिल की तीरे से।तमसो मा ज्योतिर्गमय, यही उसका संदेश रहा,हर अंधकार मिटे तभी, जब मन भीतर से प्रकाश रहा।दीपावली का अर्थ वही, जब दिलों में दीप जले,एकता, करुणा, प्रेम के संग, जीवन में उजियारा ढले।मिट्टी का दीपक कहता है — दिखावे में मत खो जाना,सच्ची दीपावली वही है, जब मन से मन तक रोशनी जाना....D.T
