1090 — टूटी आवाज़ की पुकार
1090 — टूटी आवाज़ की पुकार
कभी था एक नंबर, भरोसे का नाम,जिससे जगती थी दिलों में आरज़ू तमाम।जहाँ डर नहीं था, थी साहस की बात,महिलाओं के हक़ की उठती थी आवाज़ साफ़।वो सपना था एक, सुरक्षा का चिन्ह,जहाँ अन्याय के आगे झुकती न थी दृष्टि।हर कॉल में उम्मीद की किरण जगती थी,हर शिकायत में न्याय की रेखा थमती थी।पर अब वही आवाज़ कहीं खो गई,प्रक्रियाओं की भूलभुलैया में सो गई।काग़ज़ी जवाबों ने संवेदना ढँक ली,औपचारिकता ने फिर आस्था हटा दी।जो हिम्मत जुटाई थी कहने को सच,वो मौन में बदल गई, रह गया कष्ट।पीड़िता का मन अब थका और उदास,जब न्याय भी लगे एक दूर की आस।सवाल उठता है फिर यही बार–बार,क्या नंबर ही काफी है विश्वास का आधार।या चाहिए दिलों में कर्तव्य का संचार,जहाँ हर पुकार को मिले सच्चा व्यवहार।पुलिस का दायित्व है सुनना हर स्वर,जो डर के साए में बंधा है अंदर।संवेदना से ही बनता है तंत्र मज़बूत,न्याय तभी होता है, जब दिल हों सच के साथ रूप।आओ करें प्रण अब नई सुबह के लिए,जहाँ हर महिला निर्भय हो इस देश में जिए।जहाँ 1090 फिर आशा का प्रतीक बने,और हर पुकार पर इंसाफ़ खड़ा दिखे सच्चे तने।लेखक : देवाशीष तिवारी
