कलियुग की नारी — आधुनिकता और संस्कार का द्वंद्व
कलियुग की नारी — आधुनिकता और संस्कार का द्वंद्व
वह घर की दीपक ज्योति रही, संस्कारों की मिसाल रही,ममता की गागर थी भरपूर, पर अब सोच में हलचल रही।समय के संग बढ़ती नारी, शिक्षा का अभिमान लिए,पर भीतर कहीं छिपी अब भी, मर्यादा का मान लिए।पहले जो माँ कहानी से, जीवन का अर्थ सिखाती थी,अब मोबाइल की स्क्रीन पे, बच्चों की दुनिया सजाती है।संस्कार जहाँ संवाद थे, अब संदेश बन गए हैं,घर के कोने में रिश्ते भी, औपचारिक बन गए हैं।वह पढ़ी लिखी, आत्मनिर्भर, अपने हक़ की पहचान लिए,पर बच्चों के मन में अब कम, संस्कारों का ज्ञान लिए।स्वतंत्रता अब मूल्य नहीं, अक्सर बनती अनुशासनहीनता,जहाँ संयम था नीति कभी, वहाँ बढ़ी है स्वच्छंदता।पहले थी पूजा का दीपक, अब विज्ञान की ज्योति बनी,कभी दहलीज़ की सीमाएँ, अब दुनिया की रेखा बनी।वह डॉक्टर भी, शिक्षक भी है, सैनिक भी और माँ भी है,पर आधुनिकता की दौड़ में, थकी सी हर दुआ भी है।दिखावे के इस युग में अब, आडंबर है पहचान नई,रिश्तों की ऊष्मा खो गई, शीतल है संवेदना सभी।जो पहले नम्रता से जीती, अब आत्मसम्मान की बात करे,पर अब भी दिल में वही दया, जो जीवन में सौगात भरे।नारी दो ध्रुवों में चलती, एक प्रगति की राह लिए,दूजा संस्कारों की छाया, मन में संतुलन साध लिए।ना वह कमज़ोर, ना कठोर, बस समय की साक्षी है,जो जग को दिखा रही आज, कि नारी ही सच्ची शक्ति है।वह सीता की शालीनता है, मीरा की भक्ति भी साथ लिए,वह झाँसी की रानी जैसी, संघर्षों की बात लिए।शिक्षा और संस्कृति का संगम, जब हृदय में गूँज उठे,तब नारी का स्वरूप वही, जो मानवता को दिशा दे....D.T लेखक – देवाशीष तिवारी
