मोहब्बत जो की
मोहब्बत जो की
मोहब्बत जिस तरह की है तुझ से
ग़र, ख़ुदा, से की होती
सच कहता हूँ, जान, मेरी
उसने मुझ पर अपनी इनायत
की होती
पर मैं तो खोया रहा तेरे इश्क़ के
सुरूर में बेइंतिहा
जागते भी तुझ को सोचा और
सपनों में सिर्फ तुझे ही देखा
इस कदर मेरी रूह में बस गई है तू
की अपनी धड़कनों में सिर्फ
तुझे ही पाया
मेरा अस्तित्व, मेरा वजूद सभी
तुझ में खो चुका
मैं रहा ना खुद में सिर्फ तेरा हो चुका
अपने लिए तो अब रब को पूजता नहीं
उसके सजदे में भी सिर झुकता है
सिर्फ तेरे लिये

