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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

Abstract

मंजिल

मंजिल

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मनुष्य हैं और

ये तो मंजिल है

जाने कितनों की,

देवताओं की

परमात्मा की

यहाँ तक कि

दुनिया चलाने वाली

शक्ति की।


पृथ्वी पर

मनुष्य के प्रेम के

वशीभूत जब होती है

कोई पराशक्ति

जब भी मनुष्य को

सहायता की जरूरत होती है

सहायता उस परिदृश्य को

निर्मित करने की

जो पृथ्वी पर ही अनगिन बाधाओं

के कारण मनुष्य के लिये 

सम्भव

नहीं दिखती

शक्ति मनुष्य रूप धारण कर

मनुष्य के लिये

उसे सम्भव बना देती है


जाने कितने नाम हैं

उस शक्ति के

जाने कितने रूप हैं

उस शक्ति के

जाने कितनी कहानियां हैं

उस शक्ति की

मनुष्य रूप धारण करने की

और हम तो मनुष्य हैं

और मनुष्य होना 

मंजिल है

और मंजिल का विस्तार हो रहा है


नया स्वरूप निर्मित हो रहा है

हमारी अपनी मंजिल का

ब्रह्मांड का स्वभाव है

विस्तृत होते रहने का

और हमारी मंजिल

इसी स्वभाव के अनुरूप

इसी स्वभाव के साथ

कदमताल करती हुयी

विस्तृत हो रही है।


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