"मन में प्रीति प्रिया बसी"
"मन में प्रीति प्रिया बसी"
ऋतु आ गयी बसंत की,पंछी गायें राग।
मन में प्रीति प्रिया बसी,ज्यों पंखुड़ी पराग।।
कीर पपीहा कूकते,बगियन नाचे मोर।
फूल खिले बहु भांति के,भौंरे करते शोर।
मैं भी हूँ वन बाग में, कूक मारते काग।।
मन में प्रीति प्रिया बसी,ज्यों पंखुड़ी पराग...
धडकन काबू में नहीं,दिल तड़पे नादान।
काम तीर है छोडता,प्रेमी गाये गान।
पीली सरसों फूलती,ज्यों हल्दी हो फाग।।
मन में प्रीति प्रिया बसी,ज्यों पंखुड़ी पराग...
आयेंगे दिन प्रीति के,हिय में उठे हिलोर।
कलियों भोंरे डोलते, ज्यों ही होती भोर।
मिलन विरह को दूर कर,बुझती दिल की आग।।
मन में प्रीति प्रिया बसी,ज्यों पंखुड़ी पराग...
ऋतु आ गयी बसंत की,पंछी गायें राग।
मन में प्रीति प्रिया बसी,ज्यों पंखुड़ी पराग।।

